धनपुरी में किराये की गाड़ियों से सरकारी खेल – टेंडर से लगी गाड़ियां अब बन गईं अफसरों की निजी सवारी! असली विस्फोट तो अब होगा!

धनपुरी।

15 मार्च 2025 की शाम को सामने आई एक तस्वीर ने सरकारी सिस्टम की सबसे गहरी परतों को उजागर कर दिया है। ये वही गाड़ियां हैं जिन्हें विभाग ने टेंडर प्रक्रिया के तहत किराये पर लिया था — यानी जनता के टैक्स का पैसा देकर, सरकारी कार्यों के लिए अनुबंधित किया गया था। लेकिन अब खुलासा ये हुआ है कि वही गाड़ियां सरकारी कामकाज के बजाय अधिकारियों की निजी ऐशगाह बन चुकी हैं।

टेंडर से लगी गाड़ियां, लेकिन काम सरकारी नहीं

नियम साफ कहते हैं — टेंडर से किराये पर ली गई

गाड़ियां केवल “सरकारी उद्देश्यों” के लिए ही उपयोग की जा सकती हैं। उनका संचालन तय ड्यूटी शेड्यूल, अधिकृत मार्ग और लिखित आदेशों के तहत ही संभव है। लेकिन अब तस्वीरें और GPS डाटा ये साबित कर रहे हैं कि गाड़ियां:

ड्यूटी समय के बाद सैकड़ों किलोमीटर दूर निजी कार्यक्रमों में भेजी जा रही हैं।

ऑफिस या प्रोजेक्ट साइट के बजाय अधिकारियों के घरों, कॉलोनियों और रिश्तेदारों के ठिकानों तक जा रही हैं।

गश्त और निरीक्षण के नाम पर शॉपिंग, घूमने और धार्मिक यात्राओं तक में इस्तेमाल हो रही हैं।

विभागों में बड़ा भंडाफोड़ तय –

अब जो दस्तावेज़ और लोकेशन डाटा सामने आ रहे हैं, वे साफ़ बताते हैं कि मामला सिर्फ एक गाड़ी या एक विभाग तक सीमित नहीं है:

सिक्योरिटी विभाग में किराये की गाड़ियां 150 किमी दूर तक निजी कामों में लगाई जा रही हैं।

संचालन विभाग में “निरीक्षण” के नाम पर गाड़ियां रिश्तेदारों को छोड़ने जाती हैं।

माइंस प्रशासन की मंज़ूरी के बिना गाड़ियां दूसरे जिलों तक भेजी जा रही हैं।

और सबसे चौंकाने वाला — कई गाड़ियां टेंडर शर्तों के विपरीत उपयोग हो रही हैं, फिर भी भुगतान पूरा किया जा रहा है!

बड़ा सवाल: टेंडर की शर्तें टूटीं, जिम्मेदार कौन?

जब टेंडर दस्तावेज़ में साफ़ लिखा है कि गाड़ियों का उपयोग केवल सरकारी कार्यों के लिए होगा, तो फिर उनका उपयोग निजी कार्यक्रमों में कैसे हो रहा है?

किसने आदेश दिया?

किसने अनुमति दी?

और जब गाड़ियां ड्यूटी से हटकर निजी काम में जा रही थीं, तब भी भुगतान क्यों जारी रहा?

यह अब सिर्फ दुरुपयोग नहीं, बल्कि जनता के पैसे से की गई खुली धोखाधड़ी है।

जनता के पैसे से मौज – भुगतान की पूरी रकम गई जेब में

जांच में सामने आया है कि शर्तें टूटने के बावजूद हर महीने लाखों रुपये का भुगतान ठेकेदारों को जारी किया गया।न तो किसी अधिकारी ने उपयोग पर सवाल उठाया और न ही किसी स्तर पर जवाबदेही तय की गई। इसका मतलब साफ़ है – या तो विभाग को सब पता था और उसने जानबूझकर आंखें मूंद लीं, या फिर ऊपर तक मिलीभगत है।

अबकी बार मामला सिर्फ खबर नहीं रहेगा, यह एक विभागीय भूचाल बनेगा। टेंडर से जुड़ी हर फाइल, हर अनुमति पत्र और हर बिल की जांच की मांग उठेगी। अगला खुलासा बताएगा कि किन अधिकारियों ने इस पूरे खेल को चलाया और किसने आंखें मूंद लीं।

जुड़े रहिए… अगले चरण में सामने आएंगे वो नाम, जिन्होंने किराये की गाड़ियों को अपनी निजी संपत्ति समझ लिया — और वह धमाका इस बार मंत्रालय के दरवाजे तक जाएगा।

यह तो बस शुरुआत है… अगली तस्वीरें और डाटा सामने आए तो कई अफसरों की कुर्सियां डगमगाए बिना नहीं रहेंगी। जांच अब केवल गाड़ियों तक नहीं रुकेगी, बल्कि पूरी टेंडर प्रक्रिया, भुगतान और जिम्मेदार अधिकारियों के हस्ताक्षरों तक जाएगी।

  • Related Posts

    गणतंत्र दिवस 2026: क्यों 26 जनवरी भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण दिन है?

    24 न्यूज़ चैनल विशेष रिपोर्ट हर साल 26 जनवरी को पूरा भारत गणतंत्र दिवस (Republic Day of India) मनाता है। लेकिन बहुत से लोग आज भी यह सवाल पूछते हैं…

    धर्म बनाम फर्जीवाड़ा—SECL सोहागपुर का FOUR-WHEELER टेंडर प्रकरण सिर्फ गड़बड़ी नहीं, ‘नैतिक पतन’ का जीवंत प्रमाण

    (मामला : चार पहिया वाहन किराये पर लेने का टेंडर | स्रोत : हरिभूमि समाचार रिपोर्ट) परिचय : जब नियमों पर धूल जम जाए और सत्य दम तोड़ दे, तो…

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *