धर्म बनाम फर्जीवाड़ा—SECL सोहागपुर का FOUR-WHEELER टेंडर प्रकरण सिर्फ गड़बड़ी नहीं, ‘नैतिक पतन’ का जीवंत प्रमाण

(मामला : चार पहिया वाहन किराये पर लेने का टेंडर | स्रोत : हरिभूमि समाचार रिपोर्ट)


परिचय : जब नियमों पर धूल जम जाए और सत्य दम तोड़ दे, तो धर्म ही अंतिम न्यायालय होता है

सरकारी व्यवस्था के लिए “धर्म” का अर्थ है—
सही काम करना
सही तरीके से करना
और सही लोगों के लिए करना

लेकिन SECL सोहागपुर क्षेत्र के चार पहिया वाहन टेंडर में जो सामने आया है,
वह दिखाता है कि —
नियमों का धर्म कमजोर,
सत्य का धर्म घायल,
और कर्तव्य का धर्म मरणासन्न पड़ा है।

जब व्यवस्था का धर्म गिरता है,
तो भ्रष्टाचार कोई घटना नहीं—
पूरी व्यवस्था की मानसिकता बन जाता है।


1. एक काम—दो अनुभव प्रमाणपत्र : यह सामान्य गड़बड़ी नहीं, “दस्तावेजी पाप” है

सनातन में कहा गया है—
“असत्य का आश्रय लेने वाला व्यक्ति स्वयं नष्ट होता है और दूसरों का भी नाश करता है।”

हरिभूमि की रिपोर्ट बताती है कि—
चार पहिया वाहन टेंडर के लिए
एक ही काम पर दो-दो अनुभव प्रमाणपत्र जारी कर दिए गए!

एक में अलग आंकड़े

दूसरे में अलग

दोनों अलग-अलग तारीखों और विवरणों में परिवर्तन

यानी सत्य को कागज़ पर ही “मार” दिया गया।
यह केवल तकनीकी त्रुटि नहीं, बल्कि
स्पष्ट शंका, घोर लापरवाही और फर्जीवाड़े की बू देता है।


2. प्रशासन की चुप्पी—क्या ‘मौन’ भी अपराध है?

इतना बड़ा दस्तावेजी अंतर उजागर होने के बाद भी—

GM ऑफिस चुप

टेंडर कमेटी शांत

HQ में टालमटोल

धर्म कहता है:
“अधर्म को रोकना भी धर्म है,
और उसे न रोकना अधर्म में साझेदारी है।”

तो क्या विभाग इस साझेदारी में शामिल है?
यह बड़ा प्रश्न बनकर खड़ा है।


3. पात्रता की हत्या—योग्यता को हटाकर भ्रष्टाचार को आगे बढ़ाना सबसे बड़ा अधर्म

जिस ठेकेदार को पात्र नहीं होना चाहिए था,
उसे पात्र दिखाने के लिए
फर्जी अनुभव प्रमाणपत्र तैयार किए गए।

इसका अर्थ—

असली योग्य ठेकेदार का हक मारा गया
सरकारी कार्य की गुणवत्ता पर खतरा
नियमों की हत्या
और सबसे बड़ा—न्याय-धर्म का उल्लंघन

कर्म-धर्म कहता है—
“जो कर्तव्य का पालन नहीं करता, वह स्वयं को और समाज को दोनों को धोखा देता है।”


4. टेंडर कमेटी की भूमिका—क्या ‘धर्मभ्रष्ट निर्णय’ लिए गए?

जो तथ्य सामने आए हैं, वे प्रश्न उठाते हैं—

दस्तावेजों की जांच अधूरी

विसंगतियाँ जानबूझकर अनदेखी

ठेकेदार को लाभ पहुंचाने की प्रवृत्ति

नियमों की पवित्रता में छेद

धर्मशास्त्र कहता है—
“अन्याय को स्वीकार करने वाला भी उतना ही दोषी है जितना अन्याय करने वाला।”

इस आधार पर
टेंडर कमेटी भी समान रूप से जिम्मेदार दिखती है।


5. लोकहित का अनादर—जनता का पैसा निजी हित में बदलना ‘अधर्म’ की चरम सीमा

SECL की गाड़ियाँ जनता के संसाधनों से संचालित होती हैं।
फर्जी अनुभव पत्रों के आधार पर पात्रता देना—
सिर्फ दस्तावेजी गलती नहीं,
बल्कि जनधन पर डकैती जैसा अपराध है।

सनातन धर्म कहता है—
“सर्वजनहिताय, सर्वजनसुखाय।”

लेकिन यहाँ—
“कुछजनहिताय, कुछजनसुखाय” का खेल चलता दिख रहा है।


6. HQ में हड़कंप—क्या डर है कि धुआँ उठेगा तो आग दिख जाएगी?

खबर बताती है कि मामला HQ पहुँचते ही बेचैनी फैल गई।
हड़कंप तभी मचता है जब—

दस्तावेज़ मजबूत हों

आरोप पक्के हों

दो प्रमाणपत्र की विसंगति गंभीर हो

और सूत्र किसी ऊँचे स्थान तक पहुंचते हों

यह दिखाता है कि मामला सतही नहीं,
ऊपरी परतों तक फैला हुआ है।


7. धर्म कहता है—सत्य छुपाया नहीं जाता, उजागर होता है

यह मामला सिर्फ एक टेंडर विवाद नहीं,
बल्कि SECL के सिस्टम का “आध्यात्मिक एक्स-रे” है।

जब दस्तावेज़ों में फर्जीवाड़ा हो,
जब पात्रता में हेरफेर हो,
जब कर्तव्य में ढिलाई हो—

तो धर्म कहता है:
“न्याय में देर हो सकती है, इनकार नहीं।”

इस मामले में भी
जांच देर से होगी,
लेकिन होगी जरूर।

और तब सबसे ज्यादा नुकसान
उन्हीं को होगा जिन्होंने अधर्म को ढकने की कोशिश की है।


24 NEWS का अंतिम प्रहार : यदि धर्म गिरा तो व्यवस्था गिर जाएगी

यह मामला तीन स्तरों पर गलत है—

  1. नियम-धर्म टूटा
  2. सत्य-धर्म टूटा
  3. कर्तव्य-धर्म टूटा

इसलिए 24 News यह मांग रखता है—

चार पहिया वाहन टेंडर की स्वतंत्र, निष्पक्ष और तृतीय-पक्ष जांच की जाए
दोषियों पर विभागीय नहीं, आपराधिक कार्रवाई हो

यह केवल टेंडर का विवाद नहीं—
यह विभागीय धर्म की लड़ाई है।

यदि इस बार भी अधर्म जीता,
तो कल हर नियम,
हर दस्तावेज़,
हर पात्रता…
सबकी कीमत खत्म हो जाएगी।


स्रोत : खबर हरिभूमि समाचार में प्रकाशित रिपोर्ट पर आधारित

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