गुरु पूर्णिमा विशेष | गुरु कभी नहीं मरते… मरता केवल वह मन, जो सीखना छोड़ देता है

यह लेख शुभकामना नहीं, आत्ममंथन का निमंत्रण है। गुरु पूर्णिमा के अवसर पर स्वयं से पूछिए—क्या आपके भीतर का शिष्य अभी भी जीवित है?

लेखक: धर्मेन्द्र द्विवेदी

प्रधान संपादक, 24 न्यूज़ चैनल

आज गुरु पूर्णिमा है।

सुबह से देशभर में श्रद्धा का वातावरण है। मंदिरों में भीड़ है, आश्रमों में भजन हैं, घर-घर में गुरु वंदना हो रही है और सोशल मीडिया पर लाखों संदेश एक-दूसरे तक पहुँच रहे हैं।

लेकिन इस शोर के बीच एक प्रश्न बहुत धीरे से हमारे भीतर दस्तक देता है—

क्या हमने अपने गुरु को केवल याद रखा है, या उनकी सीख को भी?

यही प्रश्न इस लेख का कारण है।

क्योंकि समय बदल गया है।

दुनिया बदल गई है।

जीवन की गति बदल गई है।

लेकिन एक सच्चे गुरु की आवश्यकता आज भी उतनी ही है, जितनी हजारों वर्ष पहले थी।

आज हमारे पास ज्ञान का अथाह भंडार है। एक छोटी-सी स्क्रीन पर पूरी दुनिया उपलब्ध है। उत्तर पाने में अब समय नहीं लगता। कृत्रिम बुद्धिमत्ता हमारे प्रश्नों का उत्तर दे देती है। तकनीक ने असंभव को संभव बना दिया है।

फिर भी…

मनुष्य पहले से अधिक बेचैन है।

रिश्ते पहले से अधिक कमजोर हैं।

सफलताएँ पहले से अधिक हैं, लेकिन संतोष पहले से कम है।

क्यों?

क्योंकि हमने जानकारी तो बहुत इकट्ठी कर ली, लेकिन जीवन जीने की बुद्धि खोने लगे।

हमने किताबें पढ़ीं, पर स्वयं को पढ़ना भूल गए।

हमने दुनिया जीतने की तैयारी की, पर अपने मन को जीतने का अभ्यास छोड़ दिया।

शायद इसलिए गुरु आज भी प्रासंगिक हैं।

लेकिन एक प्रश्न और है—

यदि आज महर्षि वेदव्यास, कबीर, नानक, बुद्ध, चाणक्य या स्वामी विवेकानंद हमारे सामने खड़े हो जाएँ… क्या हम उन्हें पहचान पाएँगे?

शायद नहीं।

क्योंकि आज हम गुरु को उनके ज्ञान से कम और उनके प्रचार से अधिक पहचानते हैं।

हम उनके चरित्र से कम और उनके अनुयायियों की संख्या से अधिक प्रभावित होते हैं।

यहीं से हमारी भूल शुरू होती है।

भारतीय संस्कृति ने गुरु को ईश्वर से भी ऊँचा स्थान यूँ ही नहीं दिया।

ईश्वर हमें जीवन देता है।

गुरु उस जीवन का अर्थ देता है।

ईश्वर हमें संसार में भेजता है।

गुरु हमें स्वयं से मिलाता है।

गुरु वह नहीं जो केवल उत्तर दे।

गुरु वह है जो हमारे भीतर सही प्रश्न जगा दे।

जो हमें यह साहस दे कि जब पूरी दुनिया गलत दिशा में जा रही हो, तब भी हम सत्य के साथ खड़े रह सकें।

आज सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं कि अच्छे गुरु कम हो गए हैं।

सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि अच्छे शिष्य कम होते जा रहे हैं।

हम सुनते बहुत हैं…

सीखते कम हैं।

हम बोलते बहुत हैं…

समझते कम हैं।

हम प्रणाम तो कर लेते हैं…

लेकिन झुकना भूल गए हैं।

हम फूल तो चढ़ा देते हैं…

लेकिन अपना अहंकार नहीं उतारते।

और जब अहंकार बचा रह जाता है, तब ज्ञान केवल शब्द बनकर रह जाता है, जीवन नहीं बन पाता।

मुझे अपने जीवन की एक सीख याद आती है।

मेरे पहले गुरु ने एक दिन केवल इतना कहा था—

“जीवन में ऐसा कोई काम मत करना, जिससे रात को सोते समय तुम्हें अपनी ही नज़रों से नज़रें चुरानी पड़ें।”

उस समय यह केवल एक वाक्य लगा था।

आज लगता है…

पूरी जिंदगी उसी एक वाक्य में समाई हुई थी।

यही तो गुरु हैं।

वे हमें बड़े-बड़े भाषण नहीं देते।

वे हमारे भीतर एक ऐसा दीप जला देते हैं, जो जीवनभर रास्ता दिखाता रहता है।

आज समाज को ऐसे ही दीपकों की आवश्यकता है।

ऐसे शिक्षक…

ऐसे माता-पिता…

ऐसे पत्रकार…

ऐसे न्यायाधीश…

ऐसे अधिकारी…

ऐसे नागरिक…

जो केवल सफल नहीं, बल्कि सत्यनिष्ठ हों।

पत्रकारिता भी तभी सार्थक है जब वह समाज की चेतना बन सके।

जब उसकी कलम सत्ता से अधिक सत्य के प्रति उत्तरदायी हो।

जब समाचार केवल सूचना न दें, बल्कि समाज को सोचने की शक्ति भी दें।

यही पत्रकारिता का धर्म है।

और शायद यही गुरु का भी धर्म है।

इस गुरु पूर्णिमा पर यदि सचमुच अपने गुरु को कुछ अर्पित करना चाहते हैं, तो केवल फूल मत चढ़ाइए।

अपने भीतर से एक झूठ कम कर दीजिए।

एक अहंकार छोड़ दीजिए।

एक अन्याय का विरोध कर दीजिए।

एक जरूरतमंद का हाथ थाम लीजिए।

एक गलत आदत छोड़ दीजिए।

विश्वास मानिए…

हर गुरु को यही सबसे प्रिय दक्षिणा होगी।

आज रात सोने से पहले पाँच मिनट मौन रहिए।

उन सभी चेहरों को याद कीजिए जिन्होंने कभी आपको सच बोलना सिखाया…

ईमानदारी सिखाई…

संघर्ष करना सिखाया…

हारकर फिर उठना सिखाया…

और फिर मन ही मन उनसे कहिए—

“गुरुदेव… मैं आपको भूला नहीं हूँ। बस जीवन की भागदौड़ में आपकी सीख से थोड़ा दूर हो गया था। आज फिर लौट आया हूँ।”

यदि उस क्षण आपकी आँखें नम हो जाएँ…

तो समझिए…

इस वर्ष गुरु पूर्णिमा केवल कैलेंडर पर नहीं आई…

वह आपके भीतर उतर आई है।

समापन

“गुरु कभी मरते नहीं।

वे अपने शिष्यों के चरित्र में जीवित रहते हैं।

मरता केवल वह मन है, जो सीखना छोड़ देता है।

और जिस दिन मनुष्य सीखना छोड़ देता है, उसी दिन उसका भीतर का प्रकाश बुझने लगता है।”

— धर्मेन्द्र द्विवेदी

प्रधान संपादक, 24 न्यूज़ चैनल

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