(रीलन का दौर और खोता समाज)

24 News Channel प्रस्तुत करता है

चौपाल की कलम

मोबाइल और सोशल मीडिया ने लोगों की जिंदगी को जितनी तेजी से बदला है, शायद उतनी तेजी किसी और चीज ने नहीं बदली। गांव की चौपाल से लेकर शहर की सड़कों तक अब हर हाथ में मोबाइल है और हर आंख स्क्रीन पर टिकी दिखाई देती है।

रील बनाने और देखने का यह नया दौर मनोरंजन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अब लोगों की आदत और कई मामलों में लत बन चुका है। सुबह आंख खुलते ही लोग भगवान का नाम लें या न लें, लेकिन मोबाइल जरूर टटोलते हैं। रात की आखिरी गतिविधि भी मोबाइल और सुबह की शुरुआत भी उसी से।स्थिति यह हो चुकी है कि कई बार सड़क दुर्घटना में घायल व्यक्ति की मदद करने से पहले लोग उसका वीडियो बनाना शुरू कर देते हैं। किसी की तकलीफ भी अब “कंटेंट” बनती जा रही है। सोशल मीडिया पर वायरल होने की चाहत ने संवेदनाओं को कमजोर कर दिया है।

रील संस्कृति का असर युवाओं पर सबसे ज्यादा दिखाई दे रहा है। गांवों में भी अब छोटे बच्चे और युवा फिल्मी संवादों और ट्रेंडिंग गानों पर वीडियो बनाते नजर आते हैं। पढ़ाई, खेल और सामाजिक मेलजोल धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। वास्तविक जीवन से ज्यादा लोग आभासी दुनिया में सक्रिय दिखाई देते हैं।

एक और चिंता की बात यह है कि सोशल मीडिया पर हर व्यक्ति खुद को विशेषज्ञ साबित करने में लगा है। कोई बिना जानकारी के डॉक्टर बन जाता है, कोई राजनीति का ज्ञाता और कोई धर्म का ठेकेदार। गलत सूचनाएं तेजी से फैल रही हैं और समाज बिना जांचे-परखे उन पर विश्वास भी कर लेता है।

मोबाइल और इंटरनेट आधुनिक जीवन की आवश्यकता हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है। लेकिन जब तकनीक इंसान के समय, रिश्तों और संवेदनाओं पर हावी होने लगे तो यह चिंता का विषय बन जाता है।

जरूरत इस बात की है कि सोशल मीडिया का उपयोग सीमित और समझदारी के साथ किया जाए। परिवार, समाज और वास्तविक जीवन से जुड़ाव बनाए रखना आज पहले से ज्यादा जरूरी हो गया है।

मनोरंजन जरूरी है, लेकिन ऐसा मनोरंजन जो इंसान को इंसान से दूर कर दे, उस पर सोचने की आवश्यकता है।

रील बनाना गलत नहीं…लेकिन जिंदगी को सिर्फ रील बना देना निश्चित रूप से गलत है।