मध्यप्रदेश

मध्य प्रदेश में कुपोषण : बजट भरपूर, फिर भी नहीं सुधर रही बच्चों की सेहत

भोपाल , Malnutrition in Madhya Pradesh। गुना जिले में छह माह की बालिका के कुपोषण से दम तोड़ने के बाद महिला एवं बाल विकास विभाग का निगरानी तंत्र सवालों के घेरे में आ गया है। मध्य प्रदेश में भारी-भरकम बजट के बाद भी कुपोषण नियंत्रित नहीं हो रहा है। जिम्मेदार अधिकारी भी मानते हैं कि कुपोषित बच्चों की निगरानी सही नहीं होने से वे अतिकुपोषित होकर दम तोड़ रहे हैं। देश में कुपोषण के मामले में तीसरे नंबर पर होने के बावजूद प्रशासनिक मशीनरी ने उस गति से काम नहीं किया, जो करना था। प्रदेश में इस समय 57 लाख से ज्यादा बच्चे कुपोषण और अतिकुपोषण का शिकार हैं। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-4 की रिपोर्ट के मुताबिक मध्य प्रदेश में 48 लाख से ज्यादा बच्चे कुपोषित हैं। वहीं नौ लाख अतिकुपोषण की श्रेणी में हैं। वर्ष 2018 में आई इस रिपोर्ट के बाद भी प्रदेश में कुपोषित बच्चों की संख्या बढ़ी है।

वर्ष 2006 से 2016 के बीच 57 हजार बच्चों की मौत हुई है। कुपोषण से मृत्यु दर 42.8 फीसद है। इस हिसाब से बिहार व झारखंड के बाद मध्य प्रदेश का देश में तीसरा नंबर आता है। हर साल इसका बजट भी बढ़ रहा है। वर्तमान वित्तीय वर्ष में विभाग को कुपोषण से निजात पाने के लिए 1495 करोड़ रुपये मिले हैं। फिर भी हालात काबू में नहीं आ रहे हैं। गुना जिले में मनोज जाटव की बेटी हिमांशिका की मौत के बाद शहडोल में लगातार हो रही बच्चों की मौतों में भी कुपोषण का संदेह जताया जा रहा है। अभी तक इसकी पुष्टि नहीं हुई है।

अब नहीं चलेगा आंकड़ों का खेल

विभाग ने साफ कर दिया है कि अब सिर्फ संख्या देने से काम नहीं चलेगा। बल्कि बच्चे का पूरा नाम, उम्र, वजन, ऊंचाई, खानपान की स्थिति, उसके माता-पिता का नाम, पता और ताजा फोटो भी देना होगा। इतना ही नहीं, यह जानकारी पंचायत भवन और आंगनबाड़ी केंद्रों में सूचना पटल पर चस्पा भी करनी पड़ेगी। ताकि पता चले कि आखिर बात किस बच्चे की हो रही है। 31 मार्च 21 का लक्ष्य विभाग के प्रमुख सचिव शाह ने मैदानी अधिकारियों, आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं को 31 मार्च 2021 तक बच्चों को सुपोषित करने का लक्ष्य दिया है। इसके लिए जरूरी दवाओं का इंतजाम स्वास्थ्य विभाग कर रहा है।

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